आरज़ू थी कि कभी उस के बराबर बैठूँ
और इतना ही नहीं हाथ पकड़ कर बैठूँ
तेरी दुनिया में पस-ओ-पेश बहुत हैं साक़ी
इस से बेहतर है कि मैं शे'र कहूँ घर बैठूँ
तुम तो मसरूफ़ बहुत रहने लगे हो ख़ुद में
मुंतज़िर हूँ मैं, अगर तुम कहो बाहर बैठूँ
— Karan Sahar
और इतना ही नहीं हाथ पकड़ कर बैठूँ
तेरी दुनिया में पस-ओ-पेश बहुत हैं साक़ी
इस से बेहतर है कि मैं शे'र कहूँ घर बैठूँ
तुम तो मसरूफ़ बहुत रहने लगे हो ख़ुद में
मुंतज़िर हूँ मैं, अगर तुम कहो बाहर बैठूँ
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