मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे

मुझे डर ये है बुराई तेरे नाम तक न पहुंचे

मेरे पास क्या वो आते मेरा दर्द क्या मिटाते
मेरा हाल देखने को लब-ए-बाम तक न पहुंचे

हो किसी का मुझ पे एहसांये नहीं पसंद मुझ को
तेरी सुब्ह की तजल्ली मेरी शाम तक न पहुंचे

तेरी बेरुख़ी पे ज़ालिम मेरा जी ये चाहता है
कि वफ़ा का मेरे लब पर कभी नाम तक न पहुंचे

मैं फ़ुग़ान-ए-बे-असर का कभी मोतरिफ़ नहीं हूँ
वो सदा ही क्या जो उन के दर-ओ-बाम तक न पहुंचे

वो सनम बिगड़ के मुझ से मेरा क्या बिगाड़ लेगा
कभी राज़ खोल दूँ
मैं तो सलाम तक न पहुंचे

मुझे लज़्ज़त-ए-असीरी का सबक़ पढ़ा रहे हैं
जो निकल के आशियांसे कभी दाम तक न पहुंचे

उन्हें मेहरबांसमझ लें मुझे क्या ग़रज़ पड़ी है
वो करम का हाथ ही क्या जो अवाम तक न पहुंचे

हुए फ़ैज़-ए-मय-कदास सभी फ़ैज़याब लेकिन
जो ग़रीब तिश्ना-लब थे वही जाम तक न पहुंचे

जिसे मैं ने जगमगाया उसी अंजुमन में साक़ी
मेरा ज़िक्र तक न आए मेरा नाम तक न पहुंचे

तुम्हें याद ही न आऊंये है और बात वर्ना
मैं नहीं हूंदूर इतना कि सलाम तक न पहुंचे

— Kaleem Aajiz

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