क़िस्सा-ए-नक़्ल कुछ ऐसा है बताए न बने
बात बिगड़ी है कुछ ऐसी कि बनाए न बने
इम्तिहाँ हाल में हम लाए हैं इक ऐसी किताब
मुम्तहिन पूछे ये क्या है तो छुपाए न बने
इन किताबों से है पीछा भी छुड़ाना मुश्किल
और ये बोझ भी अब हम से उठाए न बने
क्या करें खेल में कम-बख़्त कशिश है ऐसी
जिस से दिल अपना हटाएँ तो हटाए न बने
सुब्ह को आँख भी खुलती नहीं जल्दी अपनी
देर हो जाए तो स्कूल भी जाए न बने
घर से भी सेनिमा जाने की इजाज़त न मिली
और स्कूल से भी भाग के आए न बने
'कैफ़' ख़ामोश रहा भी नहीं जाता मुझ से
और दर्जे में ग़ज़ल गाएँ तो गाए न बने
— Kaif Ahmad Siddiqui















