मुझे नक़्ल पर भी इतना अगर इख़्तियार होता

कभी फ़ेल इम्तिहाँ में न मैं बार बार होता

जो मैं फ़ेल हो गया तो सभी दे रहे हैं ता'ने
कोई दिल-नवाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता

मुझे आज इतनी नफ़रत से न देखती ये दुनिया
जो पढ़ाई से ज़रा भी मिरे दिल को प्यार होता

मिरे मास्टर न होते जो उलूम-ओ-फ़न में दाना
कभी मौला-बख़्श-साहब का न मैं शिकार होता

वो पढ़ाते वक़्त दर्जे में हज़ार बार बरसे
जो मुझे भी छींक आती उन्हें नागवार होता

न मैं तंदुरुस्त होता न कभी स्कूल जाता
कभी सर में दर्द रहता तो कभी बुख़ार होता

कभी मदरसे में आता कोई ऐसा चाट वाला
कि जो मुफ़्त में खिलाता न कभी उधार होता

ये गधा जो अपनी ग़फ़्लत से है बेवक़ूफ़ इतना
जो ये ख़ुद को जान जाता बड़ा होशियार होता

तिरे घर में 'कैफ़' तेरा कोई क़द्र-दाँ नहीं है
जो वतन से दूर होता तो बड़ा वक़ार होता

— Kaif Ahmad Siddiqui

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