नहीं है मुन्हसिर इस बात पर यारी हमारी

के तू करता रहे नाहक़ तरफदारी हमारी

अंधेरे में हमें रखना तो ख़ामोशी से रखना
कही बेदार ना हो जाए बेदारी हमारी

मगर अच्छा तो ये होता हम एक साथ रहते
भरी रहती तेरे कपड़ो से अल्मारी हमारी

हम आसानी से खुल जाए मगर एक मसला है
तुम्हारी सतह से ऊपर है तहदारी हमारी

कहानीकार ने किरदार ही ऐसा दिया है
अदाकारी नहीं लगती अदाकारी हमारी

हमें जीते चले जाने पर माइल करने वाली
यहा कोई नहीं लेकिन सुखनकारी हमारी

— Jawwad Sheikh

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