दर-गुज़र जितना किया है वही काफ़ी है मुझे

अब तुझे क़त्ल भी कर दूँ तो मुआ'फ़ी है मुझे

मसअला ऐसे कोई हल तो न होगा शायद
शे'र कहना ही मिरे ग़म की तलाफ़ी है मुझे

दफ़अ'तन इक नए एहसास ने चौंका सा दिया
मैं तो समझा था कि हर साँस इज़ाफ़ी है मुझे

मैं न कहता था दवाएँ नहीं काम आएँगी
जानता था तिरी आवाज़ ही शाफ़ी है मुझे

इस से अंदाज़ा लगाओ कि मैं किस हाल में हूँ
ग़ैर का ध्यान भी अब वा'दा-ख़िलाफ़ी है मुझे

वो कहीं सामने आ जाए तो क्या हो 'जव्वाद'
याद ही उस की अगर सीना-शिगाफ़ी है मुझे

— Jawwad Sheikh

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