है एक उम्र और उस में शरीक सब मेरे

मेरे लिए भी तो होते ये रोज़-ओ-शब मेरे

ख़मोश हूँ तो मुझे इतना कम जवाज़ न जान
मेरे बयान से बाहर भी हैं सबब मेरे

जो आसमाँ पे सितारे दिखाई देते हैं
ये सारे फूल हैं तेरे ये ज़ख़्म सब मेरे

किसी के अक्स से बिछड़े तो फिर ख़बर न हुई
कहाँ गए वो भला आइने अजब मेरे

वो जिस सफ़र पे गया है अगर पलट आया
गुमान है कि ले आएगा चश्म-ओ-लब मेरे

हर आन बढ़ता ही जाता है रफ़्तगाँ का हुजूम
हवा ने देख लिए हैं चराग़ सब मेरे

थे बे-शुमार मगर शे'र में इकाई हुए
'जमाल' ज़िंदगी करने के सारे ढब मेरे

— Jamal Ehsani

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