गरेबाँ को जुनूँ में ता-ब-दामन चाक होना था
जवाब-ए-जादा-ए-सहरा-ए-वहशत-नाक होना था
तग़ाफ़ुल के गिले सुन कर झुका लीं तुम ने क्यूँ आँखें
मिरे शर्मिंदा करने को ज़रा बेबाक होना था
निगाह-ए-गर्म की बिजली से जलना था मुक़द्दर में
किसी को आग होना था किसी को ख़ाक होना था
जो आँखें पूछतीं उस की तो दिल मेरा बता देता
यहाँ शर्मा के झुकना था यहाँ बेबाक होना था
तड़प दिल की दिखाना था 'जलाल' उन शोख़-चश्मों को
वहीं की बख़्त ने सुस्ती जहाँ चालाक होना था
— Jalal Lakhnavi















