हम अपने-आप से करते रहे बयाँ तन्हा

तुम्हारी बज़्म में बैठे कहाँ कहाँ तन्हा

तग़य्युरात के आसेब में वजूद मिरा
उजाड़ बन में हो जैसे कोई मकाँ तन्हा

ये सोज़-ओ-साज़ का पैकर ये हड्डियों का नगर
जो आग पाए तो चटख़े उठे धुआँ

कहीं किसी की सियासत न रंग लाई हो
भरे चमन में है क्यूँ आज बाग़बाँ तन्हा

ये बार-ए-इश्क़ जिसे आसमाँ उठा न सका
उठाए फिरता रहा हूँ मैं ना-तवाँ तन्हा

तुम्हारे आने की आहट तो कब से सुनता हूँ
चले भी आओ मिरे पास मेहरबाँ तन्हा

हमीं हरीफ़ रहे और हमीं हलीफ़ हुए
हमारे बा'द हुआ मीर-ए-कारवाँ तन्हा

वही तो दुश्मन-ए-जाँ है उसी से कैसे बचें
वो एक शख़्स जो आया था कल यहाँ तन्हा

यही ज़मीन तमद्दुन की राज़दार रही
यही ज़मीन उगलती रही धुआँ तन्हा

— Jafar Raza

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Gulshan Shayari

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