ज़िंदगी तुझ को भुलाया है बहुत दिन हम ने

वक़्त ख़्वाबों में गंवाया है बहुत दिन हम ने

अब ये नेकी भी हमें जुर्म नज़र आती है
सब के ऐबों को छुपाया है बहुत दिन हम ने

तुम भी इस दिल को दुखा लो तो कोई बात नहीं
अपना दिल आप दुखाया है बहुत दिन हम ने

मुद्दतों तर्क-ए-तमन्ना पे लहू रोया है
इश्क़ का क़र्ज़ चुकाया है बहुत दिन हम ने

क्या पता हो भी सके इस की तलाफ़ी कि नहीं
शा'इरी तुझ को गंवाया है बहुत दिन हम ने

— Jaan Nisar Akhtar

More by Jaan Nisar Akhtar

Other ghazal from the same pen

See all from Jaan Nisar Akhtar →

Charity Shayari

Shers of charity.

All Charity Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling