ज़िंदगी तू ने सुलूक ऐसे किए साथ मेरे
वो तो अच्छा है कि बाँधे हुए हैं हाथ मेरे
रोज़ मैं लौटता हूँ ख़ुद में नदामत के साथ
रोज़ मुझ को कहीं फेंक आते हैं जज़्बात मेरे
मुझ को सुनिए नज़र-अंदाज़ न कीजे साहब
मेरे हालात से अच्छे है ख़यालात मेरे
— Ismail Raaz
वो तो अच्छा है कि बाँधे हुए हैं हाथ मेरे
रोज़ मैं लौटता हूँ ख़ुद में नदामत के साथ
रोज़ मुझ को कहीं फेंक आते हैं जज़्बात मेरे
मुझ को सुनिए नज़र-अंदाज़ न कीजे साहब
मेरे हालात से अच्छे है ख़यालात मेरे
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