यूँ ही बे-यक़ीं यूँ ही बे-निशाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

कहीं हो न जाऊँ मैं राएगाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

कभी साएबान न था बहम कभी कहकशाँ थी क़दम क़दम
कभी बे-मकाँ कभी ला-मकाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

तेरे वस्ल की जो नवेद है वो क़रीब है कि बईद है
मुझे कुछ ख़बर तो हो जान-ए-जाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

कोई ताना-ज़न मेरी ज़ात पर कोई ख़ंदा-ज़न किसी बात पर
पय-ए-दिल-नवाज़ी-ए-दोस्ताँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

कभी ज़िक्र-ए-हुर्मत-ए-हर्फ़ में कभी फ़िक्र-ए-आमद-ओ-सर्फ़ में
यूँ ही रिज़्क़-ओ-इश्क़ के दरमियाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

कभी मुझ को फ़िक्र-ए-मुआश है कभी आप अपनी तलाश है
कोई गुर बताए मेरे नुक्ता-दाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

उसे पा लिया उसे खो दिया कभी हँस दिया कभी रो दिया
बड़ी मुख़्तसर सी है दास्ताँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

तेरी हर दलील बहुत बजा मगर इंतिज़ार भी ता-कुजा
ज़रा सोच तो मेरे राज़-दाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

कहाँ काएनात में घर करूँ मैं ये जान लूँ तो सफ़र करूँ
इसी सोच में था कि ना-गहाँ मेरी आधी उम्र गुज़र गई

— Irfan Sattar

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