मुझे क्या ख़बर थी मुझे दूसरों ने बताया मैं कैसा हूँ क्या आदमी हूँ

ये सब सुन के मुझ को भी लगने लगा है कि मैं वाक़ई इक बुरा आदमी हूँ

किसी को सरोकार क्या मुझ में फैली हुई इस क़यामत की बेचारगी से
अगर कोई मुझ से तअल्लुक़ भी रखता है तो यूँ कि मैं काम का आदमी हूँ

तुम्हें ये गिला है कि मैं वो नहीं जिस से तुम ने मोहब्बत के पैमा किए थे
मुझे भी ये महसूस होने लगा है कि मैं वो नहीं दूसरा आदमी हूँ

सभी हस्ब-ए-ख़्वाहिश ब-क़द्र-ए-ज़रूरत मुझे जानते हैं मुझे छानते हैं
किसी को कहाँ इतनी फ़ुर्सत जो देखे कि मैं कितना टूटा हुआ आदमी हूँ

मैं अपनी हक़ीक़त को संदूक़ में बंद कर के हर एक सुब्ह जाता हूँ दफ़्तर
कभी शाम के बा'द देखो कि मैं कैसा पुर-हाल पुर-माजरा आदमी हूँ

मैं सच बोलता हूँ कभी टोकता हूँ तो क्यूँ आप ऐसे बुरा मानते हैं
अज़ीज़ान-ए-मन आप समझे तो मुझ को कि मैं असल में आप का आदमी हूँ

मैं इक़्लीम के और तक़्वीम के किस ग़लत रास्ते से यहाँ आ गया था
मैं इस दौर में जी रहा हूँ तो बस ये समझ लो कि मैं मोजिज़ा आदमी हूँ

अँधेरा तहय्युर ख़मोशी उदासी मुजर्रद हयूले जुनूँ बे-क़रारी
ये तफ़सील सुन कर समझ तो गए हो कि मैं दिन नहीं रात का आदमी हूँ

ये क्या ज़िंदगी है ये कैसा तमाशा है मैं इस तमाशे में क्या कर रहा हूँ
मैं रोज़-ए-अज़ल से कुछ ऐसे सवालों की तकलीफ़ में मुब्तला आदमी हूँ

मेरी बद-दिमाग़ी मुनाफ़िक़ रवय्यों से महफ़ूज़ रहने का है इक तरीक़ा
मेरे पास आओ मेरे पास बैठो कि मैं तो सरापा दुआ आदमी हूँ

मैं अपने तसव्वुर में तख़्लीक़ करता हूँ इक ऐसी दुनिया जो है मेरी दुनिया
मेरी अपनी मर्ज़ी की एक ज़िंदगी है मैं तन्हाइयों में ख़ुदा आदमी हूँ

मेरा क्या त'अर्रुफ़ मेरा नाम 'इरफ़ान' है और मेरी है इतनी कहानी
मैं हर दौर का वाक़ि'आ आदमी हूँ मैं हर अहद का सानिहा आदमी हूँ

— Irfan Sattar

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