तमाम उम्र सफ़र का समर मिलेगा मुझे
पस-ए-उफ़ुक़ ही कहीं अब तो घर मिलेगा मुझे
ये किस लिए मैं ख़ला-दर-ख़ला भटकता हूँ
वो कौन है जो मिरा चाँद पर मिलेगा मुझे
मिला न जिस के लिए घर का नर्म गर्म सुकून
यहीं कहीं वो सर-ए-रहगुज़र मिलेगा मुझे
अज़ाब ये है कि तन्हा कटेगी उम्र तमाम
सफ़र के बा'द कोई हम-सफ़र मिलेगा मुझे
कहीं दिखाई न दे काश छोड़ने वाला
कहूँगा क्या मैं उसे अब अगर मिलेगा मुझे
— Iftikhar Naseem















