अपनी मजबूरी बताता रहा रो कर मुझ को

वो मिला भी तो किसी और का हो कर मुझ को

मैं ख़ुदा तो नहीं जो उस को दिखाई न दिया
ढूँढ़ता मेरा पुजारी कभी खो कर मुझ को

पा लिया जिस ने तह-ए-आब भी अपना साहिल
मुतमइन था मिरा तूफ़ान डुबो कर मुझ को

रेग-ए-साहिल पे लिखी वक़्त की तहरीर हूँ मैं
मौज आए तो चली जाएगी धो कर मुझ को

नींद ही जैसे कोई कुंज-ए-अमाँ है अब तो
चैन मिलता है बहुत देर से सो कर मुझ को

फ़स्ल-ए-गुल हो तो निकाले मुझे इस बर्ज़ख़ से
भूल जाए न तह-ए-संग वो बो कर मुझ को

— Iftikhar Naseem

More by Iftikhar Naseem

Other ghazal from the same pen

See all from Iftikhar Naseem →

Peace Shayari

Shers of peace.

All Peace Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling