ये मो'जिज़ा भी किसी की दुआ का लगता है

ये शहर अब भी उसी बे-वफ़ा का लगता है

ये तेरे मेरे चराग़ों की ज़िद जहाँ से चली
वहीं कहीं से इलाक़ा हवा का लगता है

दिल उन के साथ मगर तेग़ और शख़्स के साथ
ये सिलसिला भी कुछ अहल-ए-रिया का लगता है

नई गिरह नए नाख़ुन नए मिज़ाज के क़र्ज़
मगर ये पेच बहुत इब्तिदा का लगता है

कहाँ मैं और कहाँ फ़ैज़ान-ए-नग़्मा-ओ-आहंग
करिश्मा सब दर-ओ-बस्त-ए-नवा का लगता है

— Iftikhar Arif

More by Iftikhar Arif

Other ghazal from the same pen

See all from Iftikhar Arif →

Gaon Shayari

Shers of gaon.

All Gaon Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling