जुनूँ का रंग भी हो शोला-ए-नुमू का भी हो

सुकूत-ए-शब में इक अंदाज़ गुफ़्तुगू का भी हो

मैं जिस को अपनी गवाही में ले के आया हूँ
अजब नहीं कि वही आदमी अदू का भी हो

वो जिस के चाक-ए-गरेबाँ पे तोहमतें हैं बहुत
उसी के हाथ में शायद हुनर रफ़ू का भी हो

वो जिस के डूबते ही नाव डगमगाने लगी
किसे ख़बर वही तारा सितारा-जू का भी हो

सुबूत-ए-मोहकमी-ए-जाँ थी जिस की बुर्रीश-नाज़
उसी की तेग़ से रिश्ता रग-ए-गुलू का भी हो

वफ़ा के बाब में कार-ए-सुख़न तमाम हुआ
मिरी ज़मीन पे इक मा'रका लहू का भी हो

— Iftikhar Arif

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