शाम बाँहों में उन की गुज़र जाने दे
वक़्त अब मुझ को थोड़ा ठहर जाने दे
चल चुका हूँ बहुत मंज़िलों के लिए
भूल राहों के अब से सफ़र जाने दे
रेत साहिल की उड़ना न चाहे है अब
लहर ख़ुद को किनारे उतर जाने दे
है तमन्ना यही फूल बनकर अभी
मुझ को राहों में उन की बिखर जाने दे
— Shivam Mishra















