ख़ूब-सूरत गुलाब सी लड़की
हम ने देखी है ख़्वाब सी लड़की
बाल हैं स्याह रात के जैसे
रुख़ से है माहताब सी लड़की
राज़ ख़ुद में कई समेटे हुए
बंद है वो किताब सी लड़की
प्यार ऊँचाइयों से है उस को
उड़ती फिरती उक़ाब सी लड़की
सब मुसाफिर हैं इक मरुस्थल के
और वो है यख़ आब सी लड़की
एक लम्हें में हो गई गायब
एक दिलकश सराब सी लड़की
— Himanshu Upadhyay Som















