लोग सुब्ह-ओ-शाम की नैरंगियाँ देखा किए

और हम चुप-चाप माज़ी के निशाँ देखा किए

अक़्ल तो करती रही दामान-ए-हस्ती चाक चाक
हम मगर दस्त-ए-जुनूँ में धज्जियाँ देखा किए

ख़ंजरों की थी नुमाइश हर गली हर मोड़ पर
और हम कमरे में तस्वीर-ए-बुताँ देखा किए

हम तन-आसानी के ख़ूगर ढूँडते मंज़िल कहाँ
दूर ही से गर्द-ए-राह-ए-कारवाँ देखा किए

हम को इस की क्या ख़बर गुलशन का गुलशन जल गया
हम तो अपना सिर्फ़ अपना आशियाँ देखा किए

मौसम-ए-परवाज़ ने 'नजमी' पुकारा था मगर
पर समेटे हम क़फ़स की तीलियाँ देखा किए

— Hasan Najmi Sikandarpuri

More by Hasan Najmi Sikandarpuri

Other ghazal from the same pen

See all from Hasan Najmi Sikandarpuri →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling