उठो अब देर होती है वहाँ चल कर सँवर जाना

यक़ीनी है घड़ी दो में मरीज़-ए-ग़म का मर जाना

मुझे डर है गुलों के बोझ से मरक़द न दब जाए
उन्हें आदत है जब आना ज़रूर एहसान धर जाना

हबाब आ सामने सब वलवले जोश-ए-जवानी के
ग़ज़ब था क़ुल्ज़ुम-ए-उम्मीद का चढ़ कर उतर जाना

यहाँ जुज़ कश्ती-ए-मौज-ए-बला कुछ भी न पाओगे
इसी के आसरे दरिया-ए-हस्ती से उतर जाना

मबादा फिर असीर-ए-दाम-ए-अक़्ल-ओ-होश हो जाऊँ
जुनूँ का इस तरह अच्छा नहीं हद से गुज़र जाना

'हफ़ीज़' आग़ाज़ से अंजाम तक रहज़न ने पहुँचाया
उसी को हम-सफ़र पाया उसी को हम-सफ़र जाना

— Hafeez Jalandhari

More by Hafeez Jalandhari

Other ghazal from the same pen

See all from Hafeez Jalandhari →

Aadat Shayari

Shers of aadat.

All Aadat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling