इश्क़ में छेड़ हुई दीदा-ए-तर से पहले

ग़म के बादल जो उठे तो यहीं पर से पहले

अब जहन्नम में लिए जाती है दिल की गर्मी
आग चमकी थी ये अल्लाह के घर से पहले

हाथ रख रख के वो सीने पे किसी का कहना
दिल से दर्द उठता है पहले कि जिगर से पहले

दिल को अब आँख की मंज़िल में बिठा रक्खेंगे इश्क़ गुज़रेगा इसी राह-गुज़र से पहले

वो हर वादे से इनकार ब-तर्ज़-ए-इक़रार
वो हर इक बात पे हाँ लफ़्ज़-ए-मगर से पहले

मेरे क़िस्से पे वही रौशनी डाले शायद
शम-ए-कम-माया जो बुझती है सहरस पहले

चाक-ए-दामानी-ए-गुल का है गिला क्या बुलबुल
कि उलझता है ये ख़ुद बाद-ए-सहरस पहले

कुछ समझदार तो हैं नाश उठाने वाले
ले चले हैं मुझे इस राह-गुज़र से पहले

दिल नहीं हारते यूँ बाज़ी-ए-उल्फ़त में 'हफ़ीज़'
खेल आग़ाज़ हुआ करता है सर से पहले

— Hafeez Jalandhari

More by Hafeez Jalandhari

Other ghazal from the same pen

See all from Hafeez Jalandhari →

Baaten Shayari Collection

Shers of baaten shayari collection.

All Baaten Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling