हम ने दिल से तुझे सदा माना

तू बड़ा था तुझे बड़ा माना

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के बा'द 'अनीस' के बा'द
तुझ को माना बड़ा बजा माना

तू कि दीवाना-ए-सदाक़त था
तू ने बंदे को कब ख़ुदा माना

तुझ को पर्वा न थी ज़माने की
तू ने दिल ही का हर कहा माना

तुझ को ख़ुद पे था ए'तिमाद इतना
ख़ुद ही को तो न रहनुमा माना

की न शब की कभी पज़ीराई
सुब्ह को लाएक़-ए-सना माना

हँस दिया सत्ह-ए-ज़ेहन-ए-आलम पर
जब किसी बात का बुरा माना

यूँ तो शाइ'र थे और भी ऐ 'जोश'
हम ने तुझ सा न दूसरा माना

— Habib Jalib

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