आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह

बद-दुआएँ हैं लबों पर अब दु'आओं की जगह

इंतिख़ाब-ए-अहल-ए-गुलशन पर बहुत रोता है दिल
देख कर ज़ाग़-ओ-ज़ग़्न को ख़ुश-नवाओं की जगह

कुछ भी होता पर न होते पारा-पारा जिस्म-ओ-जाँ
राहज़न होते अगर उन रहनुमाओं की जगह

लुट गई इस दौर में अहल-ए-क़लम की आबरू
बिक रहे हैं अब सहाफ़ी बेसवाओं की जगह

कुछ तो आता हम को भी जाँ से गुज़रने का मज़ा
ग़ैर होते काश 'जालिब' आश्नाओं की जगह

— Habib Jalib

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