Gulzar
Gulzar
Ghazal

काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी

तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी

यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी

दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में
मेरे साथ चला आया है आप का इक सौदाई भी

कितनी जल्दी मैली करता है पोशाकें रोज़ फ़लक
सुब्ह ही रात उतारी थी और शाम को शब पहनाई भी

ख़ामोशी का हासिल भी इक लंबी सी ख़ामोशी थी
उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी

कल साहिल पर लेटे लेटे कितनी सारी बातें कीं
आप का हुंकारा न आया चाँद ने बात कराई भी

— Gulzar

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