देखा नहीं वो आदमी तन्हा कहूँ जिसे

वो आज तक मिला नहीं अपना कहूँ जिसे

सदियों से इंतिज़ार है उस एक शख़्स का
आए हो कितनी देर से इतना कहूँ जिसे

नज़रें तरस के रह गईं ता-अक्स-ए-आबशार
देखा नहीं है पानी का क़तरा कहूँ जिसे

कौन-ओ-मकाँ में मौजज़न है तेरी आगही
इक लम्हा भी मिला नहीं तेरा कहूँ जिसे

दरिया हूँ मौज बन के रवाँ हूँ तिरी तरफ़
उस पार कोई घर भी है अपना कहूँ जिसे

अफ़्सून-ए-इंतिज़ार तमन्ना का नाम है
हुस्न-ए-तलब में आरज़ू गोया कहूँ जिसे

— Ghalib Ahmad

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