बस गई है रग रग में बाम-ओ-दर की ख़ामोशी
चीरती सी जाती है मुझ को घर की ख़ामोशी
सुब्ह के उभरने से शाम के उतरने तक
कितनी जान-लेवा है दोपहर की ख़ामोशी
चल रही थी जब मेरे घर के जलने की तफ़तीश
देखने के क़ाबिल थी शहर भर की ख़ामोशी
काट ली हैं तुम ने तो टहनियाँ सभी लेकिन
सुन सको जो कहती है चुप शजर की ख़ामोशी
तोड़ भी दो चुप्पी को रूठने को तज डालो
हो गई है पर्बत सी बात भर की ख़ामोशी
पड़ गई है आदत अब साथ तेरे चलने की
बिन तिरे कटे कैसे ये सफ़र की ख़ामोशी
— Gautam Rajrishi















