बात रुक रुक कर बढ़ी फिर हिचकियों में आ गई

फ़ोन पर जो हो न पाई चिट्ठियों में आ गई

सुब्ह दो ख़ामोशियों को चाय पीते देख कर
गुनगुनी सी धूप उतरी प्यालियों में आ गई

ट्रेन ओझल हो गई इक हाथ हिलता रह गया
वक़्त रुख़्सत की उदासी चूड़ियों में आ गई

अध-खिली रखी रही यूँ ही वो नॉवेल गोद में
उठ के पन्नों से कहानी सिसकियों में आ गई

चार दिन होने को आए काल इक आया नहीं
चुप्पी मोबाइल की अब बेचैनियों में आ गई

बाट जो है थक गई छत पर खड़ी जब दोपहर
शाम की चादर लपेटे खिड़कियों में आ गई

रात ने यादों की माचिस से निकाली तीलियाँ
और इक सिगरेट सुलगी उँगलियों में आ गई

— Gautam Rajrishi

More by Gautam Rajrishi

Other ghazal from the same pen

See all from Gautam Rajrishi →

Bekhayali Shayari

Shers of bekhayali.

All Bekhayali Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling