जब सही शा'इरी से मिलते हैं
एक मंज़र कशी से मिलते हैं
अपना पेशा है रोज़ मिलने का
रोज़ नेकी बदी से मिलते हैं
उस ने ऐसे सलाम भेजे हैं
जो हमें अजनबी से मिलते हैं
और वो हम से ही नहीं मिलते
यार वो हर किसी से मिलते हैं
अब ख़ुदाओं से तर्क कर के सब
आइए आदमी से मिलते हैं
हम बड़े लोग हो नहीं सकते
हम सभी से सही से मिलते हैं
रोज़ दफ्तर भले नहीं जाते
पर तुझे हाज़िरी से मिलते हैं
जब जहाँ जाए रौशनी कर दे
जबकि वो सादगी से मिलते हैं
खूब मिलते हैं बंद पलकों से
और बेचेहरगी से मिलते हैं
आप तन्हाइयों में मिलिएगा
आप तिश्ना लबी से मिलते है
रंग सारे जो काइनात के है
आप की ओढ़नी से मिलते हैं
हम उसे भेज भी नहीं पाए
आज ख़त डाइरी से मिलते है
जब से ये आ गया है क़ातिल पर
ले के दिल हम छुरी से मिलते है
है वो रूठा तो उस को जाने दे
हम से मिल हम ख़ुशी से मिलते है















