दिन महीना साल बेहतर हो गया
रफ़्ता रफ़्ता हाल बेहतर हो गया
ज़िंदगी का ऊँचा नीचा रास्ता
जब हुआ पामाल बेहतर हो गया
छू लिया जिस को नए सय्याद ने
वो पुराना जाल बेहतर हो गया
कर लिए जिस दिन क़ुबूल अपने गुनाह
नामा-ए-आमाल बेहतर हो गया
आ गया जब ख़ूब-सूरत हाथ में
था जो बद-तर माल बेहतर हो गया
— G R Kanwal















