मुझे ख़बर थी वो मेरा नहीं पराया था

प धडकनों ने उसी को ख़ुदा बनाया था

मैं ख़्वाब ख़्वाब जिसे ढूँढ़ता फिरा बरसों
वो अश्क अश्क मेरी आँख में समाया था

तेरा क़ुसूर नहीं जान मेरी तन्हाई
ये रोग मैं ने ही ख़ुद जान को लगाया था

तमाम शहर में इक वो है अजनबी मुझ से
कि जिस ने गीत मेरा शहर को सुनाया था

— Farhat Shahzad

More by Farhat Shahzad

Other ghazal from the same pen

See all from Farhat Shahzad →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling