क्या टूटा है अंदर अंदर क्यूँँ चेहरा कुम्हलाया है
तन्हा तन्हा रोने वालो कौन तुम्हें याद आया है
चुपके चुपके सुलग रहे थे ज़ात में अपनी दीवाने
इक तारे ने टूट के यारो क्या उन को समझाया है
रंग-बिरंगी इस महफ़िल में तुम क्यूँ इतने चुप चुप हो
भूल भी जाओ पागल लोगों क्या खोया क्या पाया है
शे'र कहाँ हैं ख़ून है दिल का जो लफ़्ज़ों में बिखरा है
दिल के ज़ख़्म जला कर हम ने महफ़िल को गर्माया है
अब 'शहज़ाद' ये झूठ न बोलो वो इतना बे-दर्द नहीं
अपनी चाहत को भी परखो गर इल्ज़ाम लगाया है
— Farhat Shahzad















