ये बुज़दिली थी हमारी बहादुरी न हुई

हज़ार चाहा मगर फिर भी ख़ुद-कुशी न हुई

कुछ इस तरह से ख़यालों की रौशनी फैली
तुम्हारी ज़ुल्फ़ भी बिखरी तो तीरगी न हुई

ये बे-हिसी थी रग-ओ-पै में अपने वस्ल की शब
हसीन पास रहे हम से दिल-लगी न हुई

वो तीरगी थी मुसल्लत फ़ज़ा-ए-आलम पर
लहू के दीप जले फिर भी रौशनी न हुई

किसी के दर्द को मैं जानता भला क्यूँ कर
ख़ुद अपने दर्द से जब मुझ को आगही न हुई

पुकारें 'फ़ख़्र' किसे दाम-ओ-दद किसे इंसाँ
जहाँ में हम को तो इतनी तमीज़ भी न हुई

— Fakhr Zaman

More by Fakhr Zaman

Other ghazal from the same pen

See all from Fakhr Zaman →

Haseen Shayari

Shers of haseen.

All Haseen Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling