ये पैरहन जो मेरी रूह का उतर न सका

तो नख़-ब-नख़ कहीं पैवस्त रेशा-ए-दिल था

मुझे मआल-ए-सफ़र का मलाल क्यूँकर हो
कि जब सफ़र ही मेरा फ़ासलों का धोका था

मैं जब फ़िराक़ की रातों में उस के साथ रही
वो फिर विसाल के लम्हों में क्यूँ अकेला था

वो वास्ते की तेरा दरमियाँ भी क्यूँ आए
ख़ुदा के साथ मेरा जिस्म क्यूँ न हो तन्हा

सराब हूँ मैं तेरी प्यास क्या बुझाऊँगी
इस इश्तियाक़ से तिश्ना ज़बाँ क़रीब न ला

सराब हूँ कि बदन की यही शहादत है
हर एक उज़्व में बहता है रेत का दरिया

जो मेरे लब पे है शायद वही सदाक़त है
जो मेरे दिल में है उस हर्फ़-ए-राएगाँ पे न जा

जिसे मैं तोड़ चुकी हूँ वो रौशनी का तिलिस्म
शुआ-ए-नूर-ए-अज़ल के सिवा कुछ और न था

— Fahmida Riaz

More by Fahmida Riaz

Other ghazal from the same pen

See all from Fahmida Riaz →

Relationship Shayari Collection

Shers of relationship shayari collection.

All Relationship Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling