जो क़िस्सा-गो ने सुनाया वही सुना गया है

अगर था इस से सिवा तो नहीं कहा गया है

मुसाफ़िरत का हुनर है न वापसी की ख़बर
सो चल रहा हूँ जिधर भी ये रास्ता गया है

अमाँ को नील मुयस्सर न मैं कोई मूसा
मुझे सुपुर्द-ए-फ़राईल कर दिया गया है

सबब नहीं था ज़मीं पर उतारने का मुझे
सबब बग़ैर ही वापस उठा लिया गया है

ये मुंतहा है मिरी ना-रसाई का शायद
जो दूर हद्द-ए-नज़र से परे ख़ला गया है

महक उठे हैं मिरे बाग़ के ख़स-ओ-ख़ाशाक
कोई टहलता हुआ सूरत-ए-सबा गया है

— Ejaz Gul

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