ये भी मुमकिन है मियाँ आँख भिगोने लग जाऊँ

वो कहे कैसे हो तुम और मैं रोने लग जाऊँ

ऐ मिरी आँख में ठहराए हुए वस्ल के ख़्वाब
में तवातुर से तिरे साथ न सोने लग जाऊँ

मुझ को हर चीज़ मुयस्सर है मोहब्बत में सो अब
राएगानी मैं तिरे दाग़ न धोने लग जाऊँ

इतनी ख़ुश-फ़हमी में नुक़सान न हो जाए कहीं
मैं कोई पाई हुई चीज़ न खोने लग जाऊँ

जा-ब-जा बिखरे हुए हैं मिरे ख़्वाब और ख़याल
मैं ये सामान कहीं और न ढोने लग जाऊँ

झील में पाँव उतारे हैं किसी ने 'ए'जाज़'
क्यूँ न अब मैं भी यहाँ हाथ डुबोने लग जाऊँ

— Ejaaz tawakkal

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