शुक्रिया बीच सफ़र आप ने तन्हा छोड़ा

इस तरह आप ने मुझ से मिरा रिश्ता जोड़ा

शिद्दत-ए-तैश से काँप उट्ठी हैं सारी शाख़ें
जब भी गुलचीं ने किसी शाख़ से गुल को तोड़ा

अपने अंदर से वो इक दम न निकालेगा मुझे
मुझ को आँखों से वो टपकाएगा थोड़ा थोड़ा

हम ने तहज़ीब से मयख़ाने का बदला है निज़ाम
हम ने मय फेंकी न मयख़ाने में साग़र तोड़ा

दोनों ख़ुश हैं तो अब इस बात का क्या ज़िक्र करें
किस ने रुख़ अपना दर-ए-यार से पहले मोड़ा

— Ehtisham ul Haq Siddiqui

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