है निगाहों में कोह-ए-तूर मियाँ

मैं नहीं हूँ ख़ुदा से दूर मियाँ

वो भी तक़रीर कर रहे हैं जिन्हें
बोलने का नहीं शुऊ'र मियाँ

ले न डूबे तिरी इबादत को
ज़ोहद-ओ-तक़्वा का ये ग़ुरूर मियाँ

मेरे मुँह में नहीं ज़बाँ ऐसी
बोलती जो है जी-हुज़ूर मियाँ

रह के दिल्ली में भी ये लगता है
अब भी दिल्ली बहुत है दूर मियाँ

एक मक़्तल थी महफ़िल-ए-याराँ
हम ही ज़ुल्मत को समझे नूर मियाँ

ख़ूब हैं सज्दा-रेज़ियाँ तेरी
नफ़्स पर भी तो हो उबूर मियाँ

— Dr. Azam

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Ibaadat Shayari

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