क़ुदरत ने कितने रंग मिलाएँ हैं साथ साथ
गुलशन के फ़ूल ऐसे बनाएँ हैं साथ साथ
केवल जले नहीं हैं वो पन्ने क़िताब के
नफरत ने फूल भी तो जलाएँ हैं साथ साथ
ये काम महज़ आग कभी कर न पाएगी
सब को पता ही है के हवाएँ हैं साथ साथ
ये बात और है कि वो रिश्ता नहीं बचा
वरना बहुत से राज़ छुपाएँ हैं साथ साथ
— Divy Kamaldhwaj















