क्या-क्या राज़ छुपा है तेरे चेहरे में

हम ने ख़ूब लिखा था एक क़सीदे में

अबकी बार घड़ी लाए हो ले जाओ
अगली बार समय तुम लाना तोहफ़े में

हँसते हुए भी अच्छी लगती है लेकिन
और भी क़ातिल लगती है वो ग़ुस्से में

मुझ को क्या मालूम ख़ुदा भी आया था
मैं तो था मसरूफ़ किसी के सजदे में

यार मुकम्मल मेरी दुनिया कब होगी
प्यार तुम्हारा कब आएगा हिस्से में

— Divakar divyank

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Naqab Shayari

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