बस इसी बात से लगने लगा है डर मुझ को
कौन चाहेगा भला आपसे बढ़कर मुझ को
हो गया है तेरा आग़ोश मुयस्सर मुझ को
अब किसी तौर नहीं भाता है बिस्तर मुझ को
वरना मुद्दत से मैं दीवार की मानिंद ही था
वो तो तेरी सदा ने कर दिया है दर मुझ को
याद आते हैं तेरे साथ गुज़ारे लम्हे
याद आते हैं बहुत ख़ुशनुमा मंज़र मुझ को
उस को मालूम नहीं अस्ल में ख़ुशबू का पता
ढूँढ़ता है जो मेरे जिस्म में अक्सर मुझ को
वस्ल की रात भी याद आते रहे हिज्र के दिन
या'नी याद आता रहा ख़ुल्द में महशर मुझ को
— Divakar divyank















