हर काम यूँँ करो कि हुनर बोलने लगे

मेहनत दिखे सभी को असर बोलने लगे

इस बे-वफ़ा से बोलना तौहीन थी मिरी
लेकिन ये मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर बोलने लगे

तहज़ीब चुप है इल्म-ओ-अदब आज शर्मसार
देखो पिता के मुँह पे पिसर बोलने लगे

आँखों से मैं ज़बान का ऐसे भी काम लूँ
जो भी मैं कहना चाहूँ नज़र बोलने लगे

सब हम को बुत-परस्त समझते रहे मगर
ऐसे तराशे हम ने हजर बोलने लगे

दैर-ओ-हरम के नाम पे जब शहर बट गया
दोनों तरफ़ से तेग़-ओ-तबर बोलने लगे

मैं ने ग़ज़ल सुनाई 'ज़फ़र' की ज़मीन में
सब दोस्त मेरे मुझ को ज़फ़र बोलने लगे

तू है 'दिनेश' और वो है चौदहवीं का चाँद
आपस में कब से शम्स-ओ-क़मर बोलने लगे

— Dinesh Kumar

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