DILBAR
DILBAR
Ghazal

हुआ कितना आसान अब हर सफ़र है

पड़ी जब से मुर्शद की मुझ पर नज़र है

मिला है उसे हर सुकूॅं इस जहाँ में
रज़ा में रहा इन की जो भी बशर है

है जिस पर हुई इन की रहमत की बर्षा
ज़माने से उस को न फिर कोई डर है

समय रहते जो पा ले जीवन का मतलब
न उन का रहा ये अधर में सफ़र है

यहाँ पर पड़े इन के कोमल चरण हैं
बना फिर वो तीरथ ही सारा नगर है

है अरमाॅं दिलों के सुनो मेरे दिलबर
कि हर बात मानूॅं तेरी हर पहर है

— DILBAR

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