हवस से जिस्म को दो-चार करने वाली हवा

चली हुई है गुनहगार करने वाली हवा

यहीं कहीं मिरा लश्कर पड़ाव डालेगा
यहीं कहीं है गिरफ़्तार करने वाली हवा

तमाम सीना-सिपर पेड़ झुकने वाले हैं
हवा है और निगूँ-सार करने वाली हवा

पड़े हुए हैं यहाँ अब जो सर-बुरीदा चराग़
गुज़िश्ता रात थी यलग़ार करने वाली हवा

हमारी ख़ाक उड़ाती फिरे है शहर-ब-शहर
हमारी रूह का इनकार करने वाली हवा

उसी ख़राबे में रहने की ठान बैठी है
बदन का दश्त नहीं पार करने वाली हवा

न जाने कौन तरफ़ ले के चल पड़े 'आज़र'
धुएँ से मुझ को नुमूदार करने वाली हवा

— Dilawar Ali Aazar

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Kamar Shayari

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