दो आँखों से कोई कितना कितना ही रो सकता है
इस गहरे सागर का पानी भी तो कम हो सकता है
आमों से लद कर के टूटी देखो तो उस डाली को
कैसे कोई सब कुछ पाकर सब कुछ भी खो सकता है
सूरज की ज़ुल्मत से यारी होते जब से देखी है
इक पल भी चाहे तो वो जुगनू कैसे सो सकता है
जिस पौधे को सींचा उस की लकड़ी में ही दहका मैं
मैं भी सोचूँ कोई भी मेरा कैसे हो सकता है
आलाम-ए-हस्ती में भी मैं चलता जाऊँगा भगवन
देखूँ तो रस्ते में तू काँटे कितने बो सकता है
— Deenbandhu Jaiswal















