नहीं कहते किसी से हाल-ए-दिल ख़ामोश रहते हैं

कि अपनी दास्ताँ में तेरे अफ़्साने भी आते हैं

वो जिन पर फ़ख़्र है फ़र्ज़ानगी को नुक्ता-दानी को
तिरी महफ़िल में ऐसे चंद दीवाने भी आते हैं

अदब करता हूँ मस्जिद का वहाँ हर रोज़ जाता हूँ
कि उस की राह में दो-चार मयख़ाने भी आते हैं

हमारे मय-कदे में मय भी है ईमाँ की बातें भी
यहीं तो एक साहब वा'ज़ फ़रमाने भी आते हैं

न घबरा चाहने वालों से ये तो ऐन-ए-फ़ितरत है
कि शम्अ'' नूर-अफ़शाँ हो तो परवाने भी आते हैं

— Davarka Das Shola

More by Davarka Das Shola

Other ghazal from the same pen

See all from Davarka Das Shola →

Raasta Shayari

Shers of raasta.

All Raasta Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling