माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते

हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते

देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना
फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते

बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से
आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते

जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत
दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते

सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो
कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते

— Danish Naqvi

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