पगडंडी लग रही थी पहाड़ों के दरमियाँ

निकली हुई थी माँग यूँ बालों के दरमियाँ

पहले तकल्लुफ़ात सभी बरतरफ़ हुए
फिर गुफ़्तुगू शुरूअ' हुई आँखों के दरमियाँ

हिज्र-ओ-फ़िराक़ और ये तन्हाई मार दे
वक़्फ़ा अगर न दिन का हो रातों के दरमियाँ

सीने पे हाथ क्या रखा धड़कन सँभल गई
हिचकी सी एक क़ैद थी साँसों के दरमियाँ

कम-बख़्त सब के सामने ले दे न तेरा नाम
मैं ने ज़बान दाब ली दाँतों के दरमियाँ

क़ाएम है उस के दम से ही दम-ख़म अना ग़ुरूर
सर नाम की जो चीज़ है शानों के दरमियाँ

पहले मैं बात कर लूँ ज़रा ग़म-शनास की
तेरा भी होगा तज़्किरा शे'रों के दरमियाँ

कमज़ोर सी नहीफ़ सी बुलबुल के वास्ते
घमासान की लड़ाई थी चीलों के दरमियाँ

सादा-दिली तो देखिए 'दानिश-अज़ीज़' की
इक घर बना रहा है मकानों के दरमियाँ

— Danish Aziz

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