थक जाता हूँ रोज़ के आने जाने में
मेरा बिस्तर लगवा दो मयख़ाने में
उस के हाथ में फूल है मत कहिए कहिए
उस का हाथ है फूल को फूल बनाने में
मैं कब से मौक़े' की ताक़ में हूँ उस को
जान-ए-मन कह दूँ जाने अनजाने में
आँखों में मत रोक मुझे जाना है उधर
ये रस्ता खुलता है जिस तह-ख़ाने में
लाद न उस के हुस्न का इतना बोझ 'चराग़'
आ जाएगी मोच ग़ज़ल के शाने में
— Charagh Sharma















