था जो कभी इक शौक़-ए-फ़ुज़ूल
अब है वही अपना मामूल
कैसे याद रही तुझ को
मेरी इक छोटी सी भूल
ग़म बरगद का घना दरख़्त
ख़ुशियाँ नन्हे नन्हे फूल
अब दिल को समझाए कौन
बात अगरचे है माक़ूल
आँसू ख़ुश्क हुए जब से
आँगन में उड़ती है धूल
— Basir Sultan Kazmi
अब है वही अपना मामूल
कैसे याद रही तुझ को
मेरी इक छोटी सी भूल
ग़म बरगद का घना दरख़्त
ख़ुशियाँ नन्हे नन्हे फूल
अब दिल को समझाए कौन
बात अगरचे है माक़ूल
आँसू ख़ुश्क हुए जब से
आँगन में उड़ती है धूल
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